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बड़े कॉन्टेस्ट में लोकप्रिय खिलाड़ी तय करते हैं कि आपका दिन खराब जाएगा या नहीं। कम चुने गए खिलाड़ी तय करते हैं कि आपका दिन शानदार होगा या नहीं। इस दूसरे समूह को डिफरेंशियल कहते हैं, और ज़्यादातर टीमें इन्हें गलत ढंग से चुनती हैं: बहुत ज़्यादा, बिना सोचे-समझे, या गलत खिलाड़ी की जगह। यहां इन्हें सोच-समझकर चुनने का एक तरीका है।
डिफरेंशियल किसे कहते हैं
डिफरेंशियल वह खिलाड़ी है जिसे आपके कॉन्टेस्ट की थोड़ी-सी टीमों ने ही चुना हो। कई लोग मोटे तौर पर 10% से 15% को इसकी सीमा मानते हैं। अगर प्लेटफॉर्म हर खिलाड़ी के लिए “selected by” का आंकड़ा दिखाता है, तो उसका इस्तेमाल करें। अगर नहीं दिखाता, तो अंदाज़ा लगाएं: पिछले मैच के टॉप स्कोरर, सबसे बड़े नाम और वे खिलाड़ी जिनकी चर्चा कमेंटेटर पूरे हफ्ते करते रहे, ज़्यादातर टीमों में होंगे।
सिर्फ कम ओनरशिप काफी नहीं है। बहुत से खिलाड़ी इसलिए कम चुने जाते हैं क्योंकि उनके स्कोर करने की उम्मीद ही कम होती है। चुनने लायक डिफरेंशियल वह है जो कम चुना गया हो और जिसके पास आज ऐसा रोल हो जिससे बड़ा स्कोर बन सके।
ओनरशिप का गणित
मान लें कॉन्टेस्ट में 10,000 टीमें हैं। एक स्टार ओपनर उनमें से 7,000 टीमों में है। दूसरी टीम का एक कम चर्चित ओपनर 800 टीमों में है।
| वह 70 बनाता है और आपकी टीम में है | आप इनसे आगे निकलते हैं |
|---|---|
| स्टार ओपनर | वे 3,000 टीमें जिनमें वह नहीं है |
| कम चर्चित ओपनर | वे 9,200 टीमें जिनमें वह नहीं है |
वही 70 का स्कोर जब कम चर्चित खिलाड़ी से आता है, तो रैंकिंग में तीन गुना फायदा देता है। पेंच हिसाब के दूसरे हिस्से में है: अगर स्टार स्कोर करता है और आपने जगह बनाने के लिए उसे बाहर रखा था, तो 7,000 टीमें आपसे आगे निकल जाती हैं। इसीलिए डिफरेंशियल स्टार खिलाड़ियों के साथ रखे जाते हैं, उनकी जगह नहीं।
हटाएं नहीं, जोड़ें
अलग दिखने के दो तरीके हैं। पहला है हटाना (fade): ज़्यादातर टीमों में शामिल किसी खिलाड़ी को बाहर रखना और उसके फेल होने की उम्मीद करना। दूसरा है जोड़ना (add): सबकी पसंद वाले मुख्य खिलाड़ियों को रखना और बाकी जगहों पर अलग चुनाव करना। किसी स्टार को हटाना अच्छी पोज़ीशन पर खेल रहे अच्छे खिलाड़ी के खिलाफ दांव है, और यह दांव जितनी बार जीतता है, उससे ज़्यादा बार हारता है। जोड़ने की कीमत कम है: ज़्यादातर टीमों में आठवें से ग्यारहवें खिलाड़ी वैसे भी कमज़ोर चुनाव होते हैं, इसलिए उनकी जगह डिफरेंशियल लेने में लगभग कुछ नहीं जाता।
चार जगहें जहां डिफरेंशियल छिपे होते हैं
- कमज़ोर मानी जा रही टीम का टॉप ऑर्डर। नतीजा जो भी हो, ओपनर बल्लेबाज़ी तो करते ही हैं, फिर भी ज़्यादातर लोग बल्लेबाज़ों वाली जगहें फेवरेट टीम के खिलाड़ियों से भरते हैं।
- कम चर्चित टीमों के वे गेंदबाज़ जिनके ओवर तय हैं। कमज़ोर टीम के लिए भी आखिरी दो ओवर कोई न कोई डालता ही है, और उन ओवरों में विकेट गिरते हैं।
- वे खिलाड़ी जिनका रोल अभी-अभी बदला है। जिस बल्लेबाज़ को तीसरे नंबर पर भेजा जाने लगा है, या जिस तेज़ गेंदबाज़ को पहली बार नई गेंद थमाई गई है, उसे लोग अब भी पुराने रोल के हिसाब से चुनते हैं।
- दो बार फेल होने के बाद अच्छे खिलाड़ी। ओनरशिप पिछले स्कोरकार्ड के पीछे चलती है। जिस आज़माए हुए ओपनर ने 4 और 9 बनाए, वह वही खिलाड़ी है, बस उसकी लोकप्रियता अब बहुत कम है।
डिफरेंशियल क्या नहीं है
- आठवें नंबर का ऐसा बल्लेबाज़ जो गेंदबाज़ी नहीं करता। उसके कम चुने जाने की ठोस वजह है।
- स्क्वॉड का ऐसा खिलाड़ी जिसे शायद प्लेइंग इलेवन में जगह न मिले।
- अपनी जगह से हटकर खेल रहा बड़ा नाम: बल्लेबाज़ी क्रम में बहुत नीचे, या सिर्फ एक-दो ओवर डालने वाला।
- कोई भी खिलाड़ी जिसे सिर्फ इसलिए चुना गया कि उसे और कोई नहीं लेगा, और कोई वजह नहीं।
टीम में कितने रखें
| कॉन्टेस्ट | डिफरेंशियल | कैप्टन |
|---|---|---|
| हेड-टू-हेड या दस टीमों तक | एक भी नहीं, या एक | मैच में सबसे ज़्यादा शामिल रहने वाला खिलाड़ी, चाहे कितना भी लोकप्रिय हो |
| कुछ सौ टीमें | एक या दो | लोकप्रिय कैप्टन, कम लोकप्रिय वाइस-कैप्टन |
| Mega Contest | दो या तीन | डिफरेंशियल को कैप्टन या वाइस-कैप्टन बनाने पर विचार करें |
ये काम चलाने के नियम हैं, पत्थर की लकीर नहीं। इनके पीछे का सिद्धांत यह है कि कॉन्टेस्ट में जितनी ज़्यादा टीमें हों और इनाम जितना ज़्यादा ऊपर की रैंक पर सिमटा हो, इनाम वाली रैंक तक पहुंचने के लिए टीम को उतना ही ज़्यादा अलग होना पड़ता है। पूरा तर्क छोटे कॉन्टेस्ट और Mega Contest वाले पेज पर है।
एक उदाहरण से समझें
सपाट पिच पर एक T20 मैच। टीम A फेवरेट है और ज़्यादातर लोगों की टीम के मुख्य खिलाड़ी उसी से आएंगे। आपके आठ खिलाड़ी तय हो चुके हैं और तीन जगहें बाकी हैं। दावेदार ये हैं:
- टीम B का दूसरा ओपनर। वह नई गेंद का सामना करता है, और उसे कम लोग चुनते हैं क्योंकि स्टार उसका जोड़ीदार है। उसे लें।
- टीम B का डेथ ओवर गेंदबाज़। वह अठारहवां और बीसवां ओवर डालता है, जब टीम A के बल्लेबाज़ बड़े शॉट लगा रहे होंगे। उसे लें।
- टीम A का सातवें नंबर का बल्लेबाज़, एक मशहूर हिटर, जिसे इस सीरीज़ में हर मैच में बस छह गेंदें खेलने को मिली हैं। उसे छोड़ दें। नाम बड़ा है, मौका नहीं।
- टीम A का तीसरा तेज़ गेंदबाज़। वह बीच के ओवर डालता है, जहां सपाट पिच से उसे कोई मदद नहीं मिलती। उसे छोड़ दें, और आखिरी जगह किसी भरोसेमंद खिलाड़ी को दें।
दो डिफरेंशियल, दोनों उस टीम से जिसे ज़्यादातर लोग नज़रअंदाज़ कर रहे हैं, और दोनों का मैच में काम पक्का है। अगर टीम B मुकाबला कड़ा बना देती है, तो यह टीम ऊपर चढ़ती है। अगर नहीं, तब भी आठ मुख्य खिलाड़ी पॉइंट बनाते रहेंगे।
तीस सेकंड की जांच
- क्या वह घोषित प्लेइंग इलेवन में है?
- क्या वह टॉप चार में बल्लेबाज़ी करता है, या T20 में कम से कम तीन ओवर डालता है?
- क्या आज के हालात उसके जैसे खिलाड़ी के मुताबिक हैं?
- अगर वह दस ही बनाए, तब भी क्या मैं इस चुनाव से संतुष्ट रहूंगा? अगर नहीं, तो यह तुक्का है, डिफरेंशियल नहीं।
डिफरेंशियल टीम बनाने का आखिरी कदम हैं, पहला नहीं। शुरुआत संतुलित इलेवन बनाने से करें, फिर आखिरी जगहों पर सोच-समझकर अलग चुनाव करें।


